देखा है,
भीड़ को ढोते हुए, अनुशासन का बोझा.
उछालते हुए, अर्थहीन नारे
खोदते हुए अपनी कब्रें
लड़ते हुए दूसरो का युद्ध
पर, नहीं सुना कभी किसी भीड़ ने
तोड़ लिया हो,
व्यक्ति की अंतस चेतना में खिला
अनुभूति का आम्लान
पारिजात.
सुन मितवा
Desire That u Can Say me
Sunday, November 28, 2010
Saturday, November 27, 2010
Thursday, October 28, 2010
गर है रोशन तेरे घर के कोने सभी
एक दीपक पड़ोसी के घर तूं जला।
हो ख़ुशी से सरोबार सारा जहां
ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना।
एक दीपक पड़ोसी के घर तूं जला।
हो ख़ुशी से सरोबार सारा जहां
ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना।
जो हैं, मायूस दुनिया से भटके हुए
इस जमाने के दामन से छिटके हुए
उनके जीवन में खुशियों की लौ तूं जला।
ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना।
जिनकी छाया में हम हैं पले और बढ़े
उनकी काया में बल अनगिनत अब पड़े।
अपनी आंखों से उनको ये दुनिया दिखा
ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना।
मन में संकल्प का एक दीपक जला
उसमें मेहनत, लगन की तूं बाती सजा।
लक्ष्य पा जाएगा, तू ये आशा जगा
ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना।
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