सुन मितवा
Desire That u Can Say me
Sunday, November 28, 2010
देखा है,
भीड़ को ढोते हुए, अनुशासन का बोझा.
उछालते हुए, अर्थहीन नारे
खोदते हुए अपनी कब्रें
लड़ते हुए दूसरो का युद्ध
पर, नहीं सुना कभी किसी भीड़ ने
तोड़ लिया हो,
व्यक्ति की अंतस चेतना में खिला
अनुभूति का आम्लान
पारिजात.
Saturday, November 27, 2010
श्वांस का हर फूल अर्पण कर अमन को
प्यार का हर दीप पीड़ा के नमन को
है तू स्वयं परमात्मा का अंश भू पर
तू जहाँ भी है, वहीँ महका चमन को.
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