Sunday, November 28, 2010

देखा है,
भीड़ को ढोते हुए, अनुशासन का बोझा.
उछालते हुए, अर्थहीन नारे
खोदते हुए अपनी कब्रें
लड़ते हुए दूसरो का युद्ध
पर, नहीं सुना कभी किसी भीड़ ने
तोड़ लिया हो,
व्यक्ति की अंतस चेतना में खिला
अनुभूति का आम्लान
पारिजात.

Saturday, November 27, 2010

श्वांस का हर फूल अर्पण कर अमन को
प्यार का हर दीप पीड़ा के नमन को
है तू स्वयं परमात्मा का अंश भू पर
तू जहाँ भी है, वहीँ महका चमन को.

Thursday, October 28, 2010

ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना.............
गर है रोशन तेरे घर के कोने सभी
एक दीपक पड़ोसी के घर तूं  जला।
हो ख़ुशी  से सरोबार सारा जहां
ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना।

जो हैं, मायूस दुनिया से भटके हुए
इस जमाने के दामन से छिटके हुए
उनके जीवन में खुशियों की लौ तूं जला।
ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना।

जिनकी छाया में हम हैं पले और बढ़े
उनकी काया में बल अनगिनत अब पड़े।
अपनी आंखों से उनको ये दुनिया दिखा
ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना।

मन में संकल्प का एक दीपक जला
उसमें मेहनत, लगन की तूं बाती सजा।
लक्ष्य पा जाएगा, तू ये आशा  जगा
ये दीवाली तूं कुछ इस तरह से मना।

Saturday, October 23, 2010

एक दीपक लड़ रहा है अनवरत अंधियार से
लड़ रहा है कालिमा के क्रूरतम परिवार से
सूर्य की पहली किरण तक युद्ध यह चलता रहे
इसलिए अनिवार्य है कि दीप यह जलता रहे.....